Sidh kavya aur kavi  सिद्ध काव्य धारा के कवि और रचनाएँ

Sidh kavya aur kavi  सिद्ध काव्य धारा के कवि और रचनाएँ

Sidh kavya aur kavi  सिद्ध काव्य धारा के कवि और रचनाएँ | Sidh kaya aur kavi  सिद्ध काव्य धारा के कवि और रचनाएँ | Sidh kavya ar kavi  सिद्ध काव्य धारा के कवि और रचनाएँ | Sidh kava aur kavi  सिद्ध काव्य धारा के कवि और रचनाएँ | Sidh kavya aur kavi  |

रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है कि- ’84 सिद्धों में बहुत से कछुए, चमार, धोबी, डोम, कहार, लकड़हारे, दरजी तथा बहुत से शुद्र कहे जाने वाले लोग थे। अत: जाति-पांति के खंडन तो वे आप ही थे। ‘ हिंदी के प्रमुख सिद्ध कवि हैं- सरहपा, शबरपा, लुइपा, डोम्भिपा, काण्हपा, कुक्कुरिपा, तंतिपा आदि ।

Sidh kavya aur kavi  सिद्ध काव्य धारा के कवि और रचनाएँ

प्रमुख सिद्ध कवि और उनकी रचनाएँ-

No.-1. कवि       समय     रचनाएँ  ग्रन्थों की संख्या

No.-2. सरहपा  769 ई.    दोहाकोष, चर्यागीत कोष   32 ग्रंथ

No.-3. शबरपा  780 ई.    चर्यापद, चित्तगुहागम्भीरार्य, महामुद्रावज्रगीति, शुन्यतादृष्टि             –

No.-4. लुईपा                     अभिसमयविभंग, तत्त्वस्वाभाव दोहाकोश, बुद्धोदय, भगवद् भिसमय, लुईपाद गीतिका

No.-5. डोम्भिपा               840 ई.    डोम्बिगीतिका, योगचर्या, अक्षरादि, कोपदेश              31 ग्रंथ

No.-6. कण्हपा  820 ई.    कण्हपाद गीतिका, दोहा कोश, योगरत्नमाला              74 ग्रंथ

No.-7. कुक्कुरिपा                            तत्वसुखभावनासारि योगभवनोपदेश, स्रवपरिच्छेदन               16 ग्रंथ

सिद्ध कवि और उनकी रचनाएँ

No.-1. सिद्ध साहित्य संबंधी प्रमुख तथ्य-

No.-1. सामान्य रूप से हिंदी साहित्य का आरंभ सिद्धों की रचनाओं से माना जाता है।

No.-2. भरतमुनि ने लोकभाषा को ‘अपभ्रंश’ नाम न देकर ‘देशभाषा’ कहा है।

No.-3. रामचन्द्र शुक्ल ने आदिकाल के अंतर्गत् ‘देशभाषा’ शब्द ‘बोलचाल की भाषा’ के लिए किया है।

No.-4. सिद्धों का विकास बौद्ध धर्म के ब्रजयान शाखा से हुआ।

No.-5. वज्रयान में ‘युगनद्व’ की भावना पाई जाती है।

No.-6. सिद्ध साहित्य का प्रमुख केंद्र ‘श्री पर्वत’ था।

No.-7. गेय पदों की परम्परा सिद्धों से प्रारंभ होती है।

No.-8. ‘सिद्व-सिद्वांत-पद्वति’ ग्रंथ ‘हठयोग’ से संबंधित है।

No.-9. ‘बौद्ध गान औ दूहा’ सिद्धों की रचनाओं का संग्रह है जिसे हरप्रसाद शास्त्री ने बंगाक्षरों में प्रकाशित कराया था।

No.-10. ‘चर्यापद’ सिद्धों की व्यवहार संबंधी रचनाएँ हैं ।

इसे भी पढ़ें-

No.-1. आदिकालीन नाथसाहित्य के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ

No.-2. आदिकालीन जैनसाहित्य के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ

No.-1. आदिकालीन रासोसाहित्य के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ

No.-1. आदिकालीन अपभ्रंस साहित्य के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ

सरहपा (सरहपाद)-

No.-1. सरहपा का अन्य नाम ‘सरोजवज्र’ (वज्रयान से संबंध) और ‘राहुलभद्र’ (बौद्ध परम्परा से संबंध) भी है।

No.-2. सर्वमत से विद्वानों ने हिंदी का प्रथम कवि माना है।

No.-3. सरहपा 84 सिद्धों में प्रथम सिद्ध थे।

No.-4. राहुल सांकृत्यायन के अनुसार सरहपा का समय 769 ई. है।

No.-5. राहुल सांकृत्यायन ने ‘हिंदी काव्यधारा’ में सरहपा की कुछ रचनाओं का संग्रह किया है।

No.-6. इन्होने ‘सहजयान’ या ‘सहजिया’ सम्प्रदाय की स्थापना किया था।

No.-7. सहजयान के प्रवर्तक माने जाते हैं।

Sidh kavya kavi  सिद्ध काव्य धारा के कवि और रचनाएँ

लुइपा-

No.-1. चौरासी सिद्धों में सबसे ऊँचा स्थान

No.-2. रचनाओं में रहस्य भावना की प्रधानता

सिद्ध साहित्य के प्रमुख कवियों के गुरु-

कवि       गुरु

No.-1. शबरपा  सरहपा

No.-2. लुईपा     शबरपा

No.-3. डोम्भिपा               विरूपा

No.-4. कण्हपा  जालांधररपा

No.-5. कुक्कुरिपा            चर्पटीया

No.-सिद्ध कवियों के गुरु

No.-6. सिद्ध साहित्य में वर्णित पंचमकार की प्रतीकात्मक व्याख्या-

No.-7. पंचमकार के अंतर्गत् नारी के मुद्रा रूप की कल्पना मिलती है। इसके अतिरिक्त युगनद्वता की व्याख्या भी मिल जाती है, जिसमें करुणा और शून्यता के संयोग की कल्पना की गई है ।

Sidh kavy aur kavi  सिद्ध काव्य धारा के कवि और रचनाएँ

पंचमकार              प्रतीकात्मक व्याख्या

No.-1. मद्य     सहस्रदल में क्षरित होने वाली सुधा

No.-2. मत्स्य   इड़ा-पिंगला (गंगा-जमुना) में प्रवाहित श्वास

No.-3. मांस       ज्ञान से पाप हनन की प्रक्रिया

No.-4. मुद्रा       असत्य का परित्याग

No.-5. मैथुन     सहस्रार में स्थित शिव तथा कुंडलिनी का योग

No.-6. सिद्ध साहित्य में वर्णित पंचमकार

Scroll to Top