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sant kavya dhara ke kavi aur unaki rachnaye

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संत काव्य (sant kavya) परंपरा के प्रमुख कवि कबीर माने जाते हैं। अन्य कवियों में रैदास, नानक देव, हरिदास निरंजनी, दादू दयाल, मलूकदास, धर्मदास, सुंदरदास, रज्जब, गुरु अंगद, रामदास, अमरदास, अर्जुन देव, लालदास, सींगा, बाबा लाल, वीरभान, निपटनिरंजनी, शेख फरीद, संतभीषन, संत सदना, संत बेनी, संत पीपा, संत धन्ना आदि प्रमुख हैं।

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भक्तिकाल के प्रमुख संत कवि और उनकी रचनाएँ

No.-1. डॉ. पीताम्बर दत्त बड़ध्वाल ने संत शब्द का संबंध शांत से माना है जिसका अर्थ है निवृति मार्गी या वैरागी। भक्तिकाल में संत कवि (sant kavi) उन कवियों के लिए प्रयुक्त हुआ जो निर्गुण भक्ति या ज्ञानाश्रयी शाखा से संबंधित हैं। संत काव्य (sant kavya) परंपरा के प्रमुख कवि कबीर माने जाते हैं।

No.-2.  अन्य कवियों में रैदास, नानक देव, हरिदास निरंजनी, दादू दयाल, मलूकदास, धर्मदास, सुंदरदास, रज्जब, गुरु अंगद, रामदास, अमरदास, अर्जुन देव, लालदास, सींगा, बाबा लाल, वीरभान, निपटनिरंजनी, शेख फरीद, संतभीषन, संत सदना, संत बेनी, संत पीपा, संत धन्ना आदि प्रमुख हैं।

No.-3. दयाबाई, सहजोबाई, बावरी साहिबा प्रमुख निर्गुण संत महिलायें उल्लेखनीय हैं।

संत काव्य का नामकरण

No.-1. sant kavya (संत काव्य) का नामकरण आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘ज्ञानाश्रयी शाखा’, हजारी प्रसाद द्विवेदी ‘निर्गुण भक्ति’ और रामकुमार वर्मा, परशुराम चतुर्वेदी तथा गणपतिचंद्र गुप्त ‘संत काव्य’ किया है।

 संत काव्य धारा के प्रथम कवि और उसके प्रस्तोता

No.-3. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी तथा रामस्वरूप चतुर्वेदी ‘कबीरदास’ को संत काव्य धारा (sant kavyadhara) का प्रमुख कवि मानते हैं। रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है, “निर्गुण मार्ग’ के निर्दिष्ट प्रवर्तक कबीरदास ही थे।” वहीं गणपति गुप्त और रामकुमार वर्मा ‘नामदेव को संत काव्य धारा का प्रथम कवि मानते हैं।

महाराष्ट्र के प्रमुख संत

No.-1. महाराष्ट्र के संत परम्परा के आदि कवि ‘मुकुंद राज’ को माना जाता है। इन्होंने 1190 ई. में मराठी का पहला काव्य ग्रंथ ‘विवेक सिंधु’ लिखा। महाराष्ट्र में ‘महानुभाव’ और ‘बारकारी’ नामक दो संप्रदाय प्रचलित थे। ‘महानुभाव’ संप्रदाय के प्रवर्तक चक्रधर और ‘बारकारी’ सम्प्रदाय के मूल प्रवर्तक संत पुण्डलिक माने जाते हैं। परंतु ऐतिहासिक दृष्टि से बारकरी संप्रदाय के प्रथम उन्नायक संत ज्ञानेश्वर हैं।

No.-2. हिंदी में भक्ति साहित्य की परम्परा का प्रवर्तन नामदेव ने किया था। नामदेव महाराष्ट्र के भक्त संत कवि थे। इनका जन्म 1135 ई. और मृत्यु 1215 ई. में हुआ था। नामदेव जाति के दर्जी थे।

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No.-3. इनके गुरु का नाम ‘विसोवा खेचर’ था। नामदेव बारकरी संप्रदाय से जुड़े हुए थे। नामदेव की मराठी भाषा में ‘अभंग’ ग्रंथ है और हिंदी में रचित रचनाएँ गुरु ग्रंथ साहब में संग्रहित हैं।

No.-4. नामदेव (Namdev) की हिंदी में रचित सगुण भक्ति के पदों की भाषा ब्रज है। वहीं निर्गुण पदों की भाषा नाथ पंथिओं द्वारा गृहीत खड़ीबोली या सधुक्कड़ी भाषा है।

sant kaviyon ka samay

संत कवियों का जीवन परिचय और रचनाएँ

 कबीरदास | Kabir Das

No.-1. कबीर शब्द अरबी भाषा का है जिसका अर्थ होता है, महान्‌ या श्रेष्ठ। कबीर जाति के जोलाहे थे और काशी में रहते थे। कबीरदास का जन्मकाशी, 1398 ई. में और मृत्यु मगहर, बस्ती, 1518 ई. में हुआ था।

No.-2.  इनका पालन-पोषण अली या नीरू-नीमा दंपत्ति द्वारा किया गया। इनकी पत्नी का नाम लोई था। कबीर के पुत्र का नाम कमाल और पुत्री का नाम कमाली था।

No.-3. कबीरदास दिल्ली सुल्तान ‘सिकंदर लोदी’ के समकालीन थे। सिकंदर लोदी द्वारा कबीर पर किये गये अत्याचारों का उल्लेख अनन्तदास कृत- कबीर परिचई में मिलता है। ‘कबीर चरित्र बोध’ प्रथम ग्रंथ है जिसमें कबीर का अविर्भाव काल 1455 वि. संवत्‌ का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

No.-4.  मुस्लिम परंपरा सूफी फकीर शेख तकी को कबीर का गुरु मानती है, जो सिकंदर लोदी के पीर (गुरु) थे। जबकि दविस्तान के लेखक इतिहासकार मोहसिन फानी और पैशाची भाषा की कृत प्रसंग परिजात के लेखक चेतनदास ने रामाननंद को कबीर का गुरु माना है जो अद्यनत प्रमाणों से भी सर्व॑मान्य है।

No.-5.  कबीरदास के उत्तराधिकारी ‘कमाल’ व ‘धर्मदास’ थे।

No.-6. कबीर का दार्शनिक चिन्तन अद्वैतवादी है। कबीर की उलटबाँसियों पर सिद्वों एवं नाथों का प्रभाव है। कुछ विद्वानों का 7मत है कि ‘कबीर भक्त और कवि बाद में थे, समाज सुधारक पहले।’

No.-7. वहीं पुरुषोत्तम अग्रवाल का मत है की कबीर (Kabir Das) पहले कवि हैं, भक्त और समाज सुधारक बाद में।

No.-8. आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, ‘कबीर की वचनावली की सबसे प्राचीन प्रति सन 1512 ई. की लिखी है।’ सर्वप्रथम कबीर की बानियों का प्राचीनतम नमूना गुरु ग्रंथ साहिब में मिलता है।

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No.-9. कबीर की बानियों को संकलित करने का श्रेय ‘बीजक’ (1464 ई.) में उनके शिष्य ‘धर्मदास’ को है। बीजक तीन भागों में विभक्त है- साखी, सबद, रमैनी। इस तरह कबीर के तीन वाणी संग्रह हैं- साखी, सबद, रमैनी।

No.-10.  साखी- यह संस्कृत के साक्षी शब्द का विकृत रूप है और धर्मोपदेश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। कबीर की शिक्षाओं और सिद्धांन्तो का निरूपण अधिकतर साखियों में हुआ है।

No.-11. यह दोहा छंद में लिखा गया है। इसकी भाषा सधुक्कड़ी है अर्थात्‌ राजस्थानी और पंजाबी मिली हुई है।

साखियों के संबंध में कबीर के मत

No.-1. साखी आँखी ज्ञान की, समुझि लेहु मन माहिं। बिनु साखी संसार का झगड़ा छूटे नाहिं।।

No.-2. हरजी यहै विचारिया, साखी कहो कबीर। भौ सागर में जीव है, जो पकड़े यह तीर।।

No.-3. सबद- सबद (शब्द) गेय पद में रचे गये हैं, जिसमें विभिन्‍न राग-रागिनीयों का निर्वाह प्रचुर मात्रा में हुआ है। इसकी भाषा तत्कालीन मध्य देश की भाषा ब्रजभाषा और पूर्वी बोली है।

No.-4. इसमें कबीर ने आध्यात्मिक एवं रहस्यावादी अनुभूति की व्यंजना तथा साधनात्मक अर्थो के बोध के लिए प्रतीकों का प्रयोग मुक्त रूप से किया है। इसमें कबीर की प्रेम और अंतरंग साधना की अभिव्यक्ति हुई है।

No.-5. रमैनी- रमैनी का अर्थ ‘रामायण’ होता है। यह दोहा एवं चौपाई छंद में रचित है। इसमें कबीर ने रहस्यवादी और दार्शनिक विचारों को प्रगट किया है। इसकी भाषा ब्रज भाषा और पूर्वी बोली है।

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कबीर के भाषा के संबंध में विभिन्न विद्वानों के मत   

No.-1. विद्वान                मत

No.-2. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल     सधुक्कड़ी

No.-3. डॉ. श्याम सुन्दरदास          पंचमेल खिचड़ी

आचार्य रामचंद्र शुक्ल–

No.-1. “इसमें कोई संदेह नही कि कबीर ने ठीक मौके पर जनता के उस बड़े भाग को संभाला जो नाथपंथियों के प्रभाव से प्रेमभाव और भक्तिरस से शून्य शुष्क पड़ता जा रहा था।”

No.-2. “कबीर ने अपनी झाड़ फटकार के द्वारा हिन्दुओं और मुसलमानों का कट्टरपन दूर करने का जो प्रयास किया, वह अधिकतर चिढ़ाने वाला सिद्ध हुआ, हृदय को स्पर्श करने वाला नहीं।”

No.-3. “कबीर ने भारतीय ब्रह्मवाद के साथ सूफियों के भावात्मक रहस्यवाद हठयोगियों के साधनात्मक रहस्यवाद और वैष्णवों के अहिंसावाद तथा प्रपत्तिवाद को लेकर अपना पंथ खड़ा किया।”

No.-4. “भाषा बहुत परिष्कृत और परिमार्जित न होने पर भी कबीर की उक्तियों में कहीं-कहीं विलक्षण प्रभाव और चमत्कार है। प्रतिभा उनमें प्रखर थी इनमें संदेह नहीं।”

No.-5. “इसके साथ ही मनुष्यत्व की सामान्य भावना को आगे करके निम्न श्रेणी की जनता में उन्होंने (कबीर) आत्मगौरव का भाव जगाया और भक्ति के ऊँचे से ऊँचे सोपान की ओर बढ़ने के लिए बढ़ावा दिया।”

No.-6.“कबीर तथा अन्य निर्गुणपंथी संतों के द्वारा अन्तस्साधना में रागात्मिका ‘भक्ति’ और ‘ज्ञान’ का योग तो हुआ पर ‘कर्म’ की दशा वही रही जो नाथपंथियों के यहाँ थी।”

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी-

No.-1. “हिन्दी साहित्य के हजार वर्षो के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई उत्पन्न नही हुआ। महिमा में यह व्यक्ति केवल एक ही प्रतिद्वंद्वी जानता है तुलसीदास।”

No.-2. “पंद्रहवीं शताब्दी में कबीर सबसे शक्तिशाली और प्रभावोत्पादक व्यक्ति थे। …कबीर नें कविता लिखनें की प्रतिज्ञा करके अपनी बातें नही कही थी। उनकी छंदयोजना उक्तिवैचित्र्य और अलंकार विधान पूर्ण रूप से स्वाभाविक और अत्यन्तसाधित है।”

No.-3. “युगावतार की शक्ति और विश्वास लेकर वे पैदा हुए थे और एक वाक्य में उनके व्यक्तित्व को कहा जा सकता है कि वे सिर से पैर तक मस्त मौला थे बेपरवाह दृढ़ उग्र कुसुमादपि कोमल वज्रादपि कठोर।”

No.-4. “कबीर पहुचें हुए ज्ञानी थे। उनका ज्ञान पोथियों से चुराई हुई सामग्री नही था और न वह सुनी सुनाई बातों का बेमेल भण्डार ही था।”

डॉ. श्यामसुन्दर दास: भूमिका-

No.-1. “जैसा कबीर का जीवन संसार से ऊपर उठा था वैसा ही उनका काव्य भी साधारण कोटि से ऊँचा उठा है।” (कबीर ग्रंथावली)

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