Samkalin hindi naty aalochna

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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र युग में कई साहित्यिक विधाओं का नवीनीकरण हुआ। इनमें से एक आलोचना भी थी। भारतेन्दु का व्यक्तित्व भारतीय पुनर्जागरण का साहित्यिक प्रतीक और हिन्दी साहित्य में आधुनिक युग के प्रर्वतन का सूचक था उन्होंने हिन्दी साहित्य को एक नये मार्ग पर खड़ा किया “भारतेन्दु का पूर्ववर्ती काव्य साहित्य सन्तों की कुटिया से निकालकर राजाओं और रईसों के दरबार में पहुंच गया था |

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भानेमिचंद्र जैन

No.-1.      अधूरे साक्षात्कार

No.-2.      रंग-दर्शन

No.-3.      भारतीय नाट्य परम्परा

No.-4.      आधुनिक हिंदी नाटक और रंगमंच

No.-5.      रंग परम्परा

No.-6.      दृश्य- अदृश्य

No.-7.      तीसरा पाठ

No.-8.      बदलते परिदृश्य

No.-9.      जनातिक

No.-10.    नेमिचंद्र जैन

देवेन्द्र राज अंकुर

No.-1.    दर्शन-प्रदर्शन

No.-2.    रंग-कोलाज

No.-3.    पहला रंग

No.-4.    रंगमंच का सौंदर्यशास्त्र

No.-5.    सातवाँ रंग

No.-6.    पढ़ते सुनते देखते

No.-7.    अंतरंग बहिरंग

No.-8.    रंगदर्शन

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देवेन्द्र राज अंकुर

समकालीन हिंदी नट्यालोचना के अन्य आलोचक और आलोचना ग्रंथ-

No.-1.  गोविन्द चातक     नाटककार : जगदीशचंद्र माथुर,आधुनिक नाटक के अग्रदूत मोहन राकेश

No.-2.  सत्येन्द्र तनेजा     नाटककार भारतेंदु की रंग-परिकल्पना

No.-3.  दशरथ ओझा         हिंदी नाटक : उद्भव और विकास,आज का हिंदी नाटक : प्रगति और प्रभाव

No.-4.  प्रयाग शुक्ल           आज की कला

No.-5.  हृषिकेश सुलभ      रंग-अरंग,रंगमंच का जनतंत्र

No.-6.  सिद्धनाथ कुमार    हिंदी एकांकी

No.-7.  स्वयंप्रकाश            रंगशाला में एक दोपहर

No.-8.  कमला प्रसाद         रचना और आलोचना की द्वन्द्वात्मकता,दरअसल

No.-9.  भवदेव पाण्डेय       भारतेंदु हरिश्चन्द्र : नए परिदृश्य,बंगमहिला : नारीमुक्ति का संघर्ष,आचार्य रामचंद्र शुक्ल आलोचना के नए मानदंड

No.-10.         आशीष त्रिपाठी            समकालीन हिंदी रंगमंच और रंगभाषा

No.-11.         अरविंद त्रिपाठी            हिंदी आलोचना के नवरंग

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