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“साधारणीकरण द्वारा कवि निर्मित पात्र व्यक्ति-विशेष म रहकर सामान्य प्राणिमात्र बन जाते हैं, अर्थात वे किसी देश एवं काल की सीमा में बध्द न रहकर सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक बन जाते हैं, और उनके इस स्थिति में उपस्थित हो जाने पर सहृदय भी अपने पूर्वग्रहों से विमुक्त हो जाता है।” पं. राज जगन्नाथ ने ‘दोष-दर्शन’ के आधार पर साधारणीकरण की प्रक्रिया का समाधान प्रस्तुत किया।

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आचार्य  साधारणीकरण

No.-1. भट्ट नायक            विभावादि का साधारणीकरण होता है।

No.-1. अभिनव गुप्त      सहृदय का साधारणीकरण होता है।

No.-1. विश्वनाथ             विभावादि का अपने पराये (आश्रय और सहृदय) की भावना से मुक्त होना साधारणीकरण है।

No.-1. रामचन्द्र शुक्ल   आलम्बनत्व धर्म का साधारणीकरण होता है

No.-1. श्याम सुंदर दास  सहृदय के चित्त का साधारणीकरण होता है।

No.-1. नगेन्द्र   कवि की अनुभूति का साधारणीकरण होता है।

साधारणीकरण

No.-1. आधुनिक काल में साधारणीकरण के संदर्भ में सर्वप्रथम चिंतन आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया। आधुनिक चिंतकों में श्यामसुन्दर दास, नगेन्द्र, नंददुलारे वाजपेयी तथा केशव प्रसाद मिश्र आदि ने भी साधारणीकरण की व्याख्या प्रस्तुत की है, जिनकी महत्वपूर्ण स्थापनाएं निम्न हैं-

No.-2. रामचंद्र शुक्ल के अनुसार साधारणीकरण आलंबनत्व धर्म का होता है। वे सहृदय का आश्रय (आश्रयत्व) से तादात्म्य स्वीकार करते हैं और आलम्बन (आलंबनत्व) का साधारणीकरण।

No.-3. श्यामसुंदर दास ने भावक या पाठक का साधारणीकरण माना है। उन्होंने साधारणीकरण की व्याख्या करने में ‘मधुमती’ भूमिका की परिकल्पना प्रस्तुत की। उनकी दृष्टि विषय की अपेक्षा विषयी की तरफ अधिक रही है।

No.-4. नगेंद्र के मतानुसार साधारणीकरण कवि-भावना का होता है।

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No.-5. नगेंद्र के मतानुसार साधारणीकरण कवि की अनुभूति का होता है, न आश्रय (राम) और न ही आलम्बन (सीता) का। उन्हीं के शब्दों में, “जिसे हम आलम्बन कहते हैं वह वास्तव में कवि की अपनी अनुभूति का साधारणीकरण है।” उन्हीं के शब्दों में- “कवि वह होता है, जो अपनी अनुभूति का साधारणीकरण कर सके, दूसरे शब्दों में ‘जिसे लोक हृदय की पहचान हो।”

No.-6. नंददुलारे वाजपेयी ने कवि तथा सहदय के बीच भावना के तादात्म्य को ही साधारणीकरण माना है।

No.-7. केशव प्रसाद मिश्र ने सहृदय की चेतना का साधारणीकरण माना है।

No.-8. इसे भी पढ़ सकते हैं-

भारतीय काव्यशास्त्र के प्रमुख आचार्य एवं उनके ग्रंथ कालक्रमानुसार

No.-1. रस सिद्धांत | भरत मुनि का रस सूत्र और उसके प्रमुख व्याख्याकार

No.-2. मूल रस | सुखात्मक और दुखात्मक रस | विरोधी रस

No.-3. रस का स्वरूप और प्रमुख अंग

No.-4. हिन्दी आचार्यों एवं समीक्षकों की रस विषयक दृष्टि

 

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