Ritikal ki pramukh pravritiyan

Ritikal ki pramukh pravritiyan | Ritikal k pramukh pravritiyan | Ritikal pramukh pravritiyan | Ritikal ki pramkh pravritiyan | Ritikal ki pramukh prvritiyan | Ritikal ki pramukh pravrityan | Ritikal ki pramkh pravritiyn | Ritikal ki prmukh pravritiyan |

रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्ति रीति निरूपण या लक्षण-ग्रंथों का निर्माण है। इन कवियों ने संस्कृत के आचार्यों का अनुकरण पर लक्षण-ग्रंथों अथवा रीति ग्रंथों का निर्माण किया है। फिर भी इन्हें रीति निरूपण में विशेष सफलता नहीं मिली है। इनके ग्रंथ एक तरह से संस्कृत-ग्रंथों में दिए गए नियमों और तत्वों का हिंदी पद्य में अनुवाद हैं।

Ritikal ki pramukh pravritiyan

  1. रीति निरूपण/लक्षण ग्रंथों की प्रधानता, 2. श्रृंगारिकता, 3. आलंकारिकता, 4. आश्रयदाताओं की प्रशंसा/राजप्रशस्ति, 5. चमत्कार प्रदर्शन एवं बहुज्ञता, 6. उद्दीपन रूप में प्रकृति का चित्रण, 7. ब्रज भाषा की प्रधानता, 8. भक्ति और नीति, 9. मुक्तक शैली की प्रधानता, 10. संकुचित जीवन दृष्टि, 11. नारी के प्रति कामुक दृष्टिकोण, 12. स्थूल एवं मांसल सौंदर्य का अंकन

लक्षण ग्रंथों की प्रधानता

No.-1.रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्ति रीति निरूपण या लक्षण-ग्रंथों का निर्माण है। इन कवियों ने संस्कृत के आचार्यों का अनुकरण पर लक्षण-ग्रंथों अथवा रीति ग्रंथों का निर्माण किया है।

No.-2.फिर भी इन्हें रीति निरूपण में विशेष सफलता नहीं मिली है। इनके ग्रंथ एक तरह से संस्कृत-ग्रंथों में दिए गए नियमों और तत्वों का हिंदी पद्य में अनुवाद हैं। जिसमें मौलिकता और स्पष्टता का अभाव है।

No.-3. इन कवियों ने कवि कर्म की अपेक्षा कवि शिक्षक की भूमिका में नजर आते है। रीति निरूपण करने वाले आचार्यों के 2 भेद हैं- सर्वांग और विशिष्टांग निरूपक।काव्यांग परिचायक कवियों का उद्देश्य काव्यांगों का परिचय देना है।

No.-4.इन्होंने लक्षण ग्रंथों के साथ अन्य कवियों की कविताओं का उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। वहीं रीति निरूपण एवं काव्य रचना को बराबर महत्व देने वाले कवियों के ग्रंथों में लक्षण और उदाहरण, दोनों उन्हीं के द्वारा रचित है।

No.-5.इनके अलावा तीसरा वर्ग उन कवियों का है जिन्होंने रीति तत्व तो उनके ग्रंथों में मिलता है परंतु काव्यांगों का लक्षण उन्होंने नहीं दिया है।

श्रृंगारिकता

No.-1.रीतिकाल की दूसरी बड़ी विशेषता श्रृंगार रस की प्रधानता है। इस काल की कविता में नखशिख और राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं का चित्रण व्यापक स्तर पर हुआ है। दरबारी परिवेश के फलस्वरूप नारी केवल पुरुष के रतिभाव का आलम्बन बनकर रह गई।

No.-2. श्रृंगार के दोनों पक्षों का वर्णन इस युग की कविताओं में हुआ है। श्रृंगार में आलंबन और उद्दीपन के बड़े ही सरस उदाहरणों का निर्माण हुआ है।

No.-3.संयोग चित्रण में कहीं-कहीं रति चित्रण की वजह से अश्लीलता भी दिखाई देती है, वहीं वियोग वर्णन में कवि-कर्म ऊहात्मक और खिलवाड़ बन कर रह गया है।

No.-4. भागीरथी मिश्र ने इन कवियों के बारे में लिखा है की, ‘उनका दृष्टिकोण मुख्यतः भोगपरक था, इसलिए प्रेम के उच्चतर सोपानों की ओर वे नहीं जा सके। प्रेम की अनन्यता, एकनिष्ठता, त्याग, तपश्या आदि उदात्त पक्ष उनकी दृष्टि में बहुत कम आयें हैं।

No.-5.रीतिबद्ध कवियों के प्रेम चित्रण में जहाँ रसिकता और कामुकता दिखाई देती है वहीं दूसरी तरफ रीतिमुक्त कवियों के यहाँ प्रेम चित्रण में स्वच्छंदता, उदात्तता एवं अकृत्रिमता दिखाई देती है।

No.-6. रीतिमुक्त कवियों के यहाँ विरह वर्णन की प्रधानता है परंतु विरह ताप की अतिशयता एवं विरहजन्य उहात्मकता नहीं दिखाई पड़ती।

लंकारिकता

No.-1.रीति काल की एक अन्य प्रधान प्रवृत्ति आलंकारिकता भी है। इसका कारण राजदरबारों का विलासी वातावरण तथा ये कवि कविता को अलंकारों से सजाने को अपनी सार्थकता भी समझते थे।

No.-2.इस युग के कवियों सभी अलंकारों का निरूपण अपनी कविताओं में किया है। यहाँ कविता साधन न होकर साध्य है। अधिकतर कवियों ने अलंकारों के लक्षण उदाहरण दिए, लेकिन बहुतों ने केवल उदाहरण ही लिखे, जबकि उनके मन में लक्षण विद्यमान थे।

No.-3. इस युग में अलंकारों का इतना अधिक प्रयोग हुआ कि वह साधन न रहकर साध्य हो गया। कभी-कभी केवल अलंकार ही अलंकार स्पष्ट होते हैं

No.-4.और कवि का अभिप्रेत अर्थ उसी चमत्कार में कहीं खो जाता है। इस अलंकार प्रेम की वजह से इस दौड़ की कविताएँ विकृति भी हो गया है।

No.-5.यह दोष रीति कालीन कविता में प्राय: दिखाई पड़ता है। केशव को इसी कारण शुक्ल जी ने कठिन काव्य का प्रेत कहा है।

No.-6.केशवदास अलंकार विहीन कविता को काव्य मानते ही नहीं, भले ही उसमें अन्य कितने ही गुण विद्यमान हों।

Ritikal k pramukh pravritiyan

आश्रयदाताओं की प्रशंसा/राजप्रशस्ति

No.-1.रीतिकाल के अधिकांश कवि दरबारी कवि थे, राजाओं के आश्रय में रहते थे, इसलिए इन आश्रयदाताओं का गुणगान करना इनकी मज़बूरी भी थी। परिणाम स्वरूप इन कवियों ने अपने आश्रयदाताओं की प्रशंसा अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से किया है

No.-2. भूषण जैसे कुछ कवि अपवाद हैं। रीतिमुक्त कवियों ने आत्माभिव्यक्ति को अपने काव्य में अभिव्यक्त किया है।

 चमत्कार प्रदर्शन एवं बहुज्ञता

No.-1.इस युग के कवियों ने चमत्कार प्रदर्शन के साथ बहुज्ञता का भी प्रदर्शन अपने ग्रंथों में किया है। चमत्कार प्रदर्शन के अंतर्गत विभिन्न अलंकारों के प्रयोग के साथ शब्दों की पच्चीकारी एवं रमणीयता पर ज्यादा ध्यान दिया गया है

No.-2. वहीं बहुज्ञता को प्रदर्शित करने के लिए साहित्येतर विषयों- ज्योतिष, गणित, काव्य एवं नीतिशास्त्र आयुर्वेद जैसे विषयों को भी अपने काव्य का माध्यम बनाया है।

 उद्दीपन रूप में प्रकृति का चित्रण

No.-1.रीतिकाल (ritikal) में प्रकृति-चित्रण प्रायः उद्दीपन रूप में हुआ है। प्रकृत का स्वतंत्र और आलम्बन रूप में चित्रण बहुत कम हुआ है।

No.-2. दरबारी कवि जिसका आकर्षण केन्द्र नारी थी इसलिए इन कवियों का ध्यान प्रकृति के स्वतंत्र रूप की ओर नहीं गया है। प्रकृति के उद्दीपन रूप का चित्रण भी परम्परागत है।

No.-3. नायक-नायिका की मानसिक दशा के अनुरूप प्रकृति भी संयोग में सुखद एवं वियोग में दुखद रूप में चित्रित हुई है। सेनापति और पद्माकर जैसे कवि इसके अपवाद हैं। क्योंकि सेनापति और पद्माकर के यहाँ वर्षा एवं वसंत ऋतु का आकर्षक वर्णन हुआ है।

 ब्रजभाषा की प्रधानता

No.-1.रीति काल ब्रजभाषा का स्वर्ण युग रहा है क्योंकि जहाँ भक्तिकाल में यह भाषा कृष्ण भक्ति कवियों तक सीमित थी वहीं इस काल तक आते-आते पूर्ण रूप से काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो गई।

No.-2. इसके बाद ब्रज भाषा में लगभग 200 वर्षों तक हिंदी कविता पर छाई रही। ब्रज भाषा के प्रभाव का अंदाजा आप इस तरह लगा सकते हैं की इसमें ब्रज के बाहर के कवियों ने भी इसी को अपना काव्य भाषा बनाया।

No.-3. इस युग की कविताओं में आप फारसी के प्रभाव को भी देख सकतें हैं, इसकी वजह उस समय के दरबारी जीवन और सत्ता पर मुसलमान शासकों के आसीन होना प्रमुख वजह है।

Ritikal prmukh pravritiyan

 भक्ति और नीति

No.-1.रीतिकाल में भले ही रीति निरूपण, श्रृंगार और अलंकार की प्रधानता हो, व्यापक मात्रा में भक्ति और नीति से संबंधित पद भी मिल जाते हैं जो इस युग की एक नई देन है।

No.-2. राधा-कृष्ण लीलाओं में शृंगारिकता के साथ भक्ति भावना भी विद्यमान है। नगेंद्र ने भी लिखा है की, ‘रीतिकाल का कोई भी कवि भक्ति भावना से हीन नहीं है- हो भी नहीं सकता था।

No.-3. दरबारी वातावरण के परिणाम स्वरूप इनके कविताओं में नीति संबंधी उक्तियाँ भी मिल जाती है। इस क्षेत्र में वृन्द के नीति दोहे, गिरधर की कुंडलियाँ तथा दीनदयाल गिरि की अन्योक्तियाँ उल्लेखनीय हैं।

 मुक्तक शैली की प्रधानता

No.-1.रीति काल में कुछ प्रबंध काव्य जरूर लिखे गये हैं परंतु मुक्तक-काव्य रूप को प्रधानता मिली है। दरबारी वातावरण में मुक्तक रचनाएँ ही ज्यादा उपयुक्त थीं

No.-2. क्योंकि राजाओं-सामंतों के पास प्रबंध काव्य को सुनने का न तो समय था न ही धैर्य। अत: इस काल में मुक्तकों (कवित्त और सवैयों) की प्रधानता रही है।

No.-3. कवित्त में वीर और श्रृंगार रसों का प्रयोग तथा सवैयों में श्रृंगार रस का प्रयोग हुआ है। बिहारी जैसे कवियों ने दोहा छंद के सीमित शब्दों में अधिक अर्थ व्यक्त करने की कला को विकसित किया।

Ritikal ki pramkh pravritiyan

 संकुचित जीवन दृष्टि

No.-1.रीति काल के कवियों की कविताओं में कोई महान या उच्च उदेश्य नहीं दिखाई देता है, अधिकतर कवियों ने अपने आश्रयदाताओं को खुश करने के लिए श्रृंगार और मनोरंजन पूर्ण काव्य की रचना की है। ।

No.-2. रीति कालीन कवियों के यहाँ उत्तम काव्य रचना के लिए जीवन के प्रति जिस व्यापक दृष्टिकोण की अपेक्षा की जाती है उसका नितांत अभाव दिखाई देता है।

No.-3. दरबारी परिवेश और विलासिता पूर्ण जीवन की वजह से इनका दृष्टि इतना संकुचित हो गया की जीवन के विविध पहलू छूट गये।

 नारी के प्रति कामुक दृष्टिकोण

No.-1.रीतिकालीन कवियों के यहाँ नायिका के नख-शिख वर्णन व्यापक पैमाने पर हुआ है। नारी के वाह्य रूप, स्थूल एवं मांसल चित्रण में उनकी वृत्ति अधिक रमी है।

No.-2. यह परिवेश ही ऐसा था जहाँ स्त्री को भोग-विलास की वस्तु समझा जाता था, कामुक दृष्टि से देखा जाता था। इसीलिए स्त्रियों के दूसरे महत्वपूर्ण पहलू छूट गये हैं और इन कवियों का दृष्टि एकांगी हो गया है।

No.-3. हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में, ‘यहाँ नारी कोई व्यक्ति या समाज के संगठन की इकाई नहीं है, बल्कि सब प्रकार की विशेषताओं के बंधन से यथासंभव मुक्त विलास का एक उपकरण मात्र है।’

 स्थूल एवं मांसल सौंदर्य का अंकन

No.-1.रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध कवियों के यहाँ स्थूल एवं मांसल सौंदर्य का वर्णन हुआ है लेकिन रीतिमुक्त कवियों के यहाँ सौंदर्य सूक्ष्म एवं मनोरम वर्णन दिखाई पड़ता है।

Scroll to Top