Mool ras virodhi ras

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श्रव्य काव्य के पठन अथवा श्रवण एवं दृश्य काव्य के दर्शन तथा श्रवण में जो अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है, वही काव्य में रस कहलाता है। रस के जिस भाव से यह अनुभूति होती है कि वह रस है, स्थायी भाव होता है। रस, छंद और अलंकार – काव्य रचना के आवश्यक अवयव हैं। :*मुख्य बिंदु #प्राचीन काव्य-शास्त्रियों के अनुसार रसों की संख्या नौ है।

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No.-1. मूल रस →           व्युत्पन्न रस

No.-2. श्रृंगार रस              →           हास्य

No.-3. रौद्र         →           करुण रस

No.-4. वीर         →           अद्भुत

No.-5. वीभत्स →           भयानक

मूल रस के संदर्भ में आचार्यों की अलग-अलग राय है-

No.-1.भवभूति   करुण रस              “एको रस: करुणा एव।”

No.-2.भोज         श्रृंगार रस              “श्रृंगारमेव रसनाद् रसमामनाम:।”

No.-3.नारायण पंडित       अद्भुत रस              “तच्चमत्कार-सारत्वे सर्वत्राप्यभूतो रसः।”

No.-4.विश्वनाथ                अद्भुत रस              सर्वप्रथम विश्वनाथ के प्रपितामह नारायण पंडित ने अद्भुत रस को मूल रस माना था, विश्वनाथ ने उन्हीं का मत उधृत किया है।

No.-5.रूप गोस्वामी          मधुर रस

No.-6.अभिनव गुप्त        शान्त रस              “स्वं स्वं निमित्तमासाद्य शांताद्वाव: प्रवर्तते।”

No.-7.मधुसूदन सरस्वती एवं रूप गोस्वामी               भक्ति रस

No.-8.केशवदास               श्रृंगार रस              सबको केसवदास कहिं नायक है सिंगार।

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No.-9.मूल रस के संदर्भ में आचार्यों के मत

No.-10.भोज ने रस का मूल अहंकार को माना है, उनके अनुसार अहंकार ही विभाव तथा भावों के द्वारा आनंद के रूप में परिणत होकर रसत्व ग्रहण करता है और वह अहंकार अन्य कुछ नहीं श्रृंगार ही है। भोजराज ने रस, अंहकार, अभिमान और श्रृंगार को पर्यायवाची शब्द माना है।-“रसोअभिमानोअहंकार: श्रृंगार इति गीयते।”- सरस्वतीकंठाभरण

No.-11.भरत- “संसार में जो भी पवित्र, विशुद्ध, उज्ज्वल और दशर्नीय है, उसकी उपमा श्रृंगार रस से दी जाती है।”

No.-12.रुद्रट- “श्रृंगार रस जैसी रस्यता को अन्य कोई रस उत्पन्न नहीं कर सकता। इस रस में ही आबाल-वृद्धि सभी मानव ओतप्रोत हैं। इस रस के समावेश के बिना काव्य हीन कोटि का है। अंत: इसके निरूपण में कवि के लिए विशेष प्रयत्न अपेक्षित है।”

No.-13.आनंदवर्द्धन- “श्रृंगार ही सर्वाधिक मधुर और परम आह्लादक रस है।”

No.-14.अभिनवगुप्त- “श्रृंगार रस सर्वाधिक कमनीय है- यह तथ्य अनुभव-सिद्ध है, अंत: यह सर्वप्रधान है।”

No.-15.हेमचंद, विद्याधर और रामचंद्र-गुणचंद्र आदि- “काम सब प्राणियों में सुलभ तत्व है तथा उन्हें अत्यन्त परिचित रहता है, अत: सबको मनोहर प्रतीत होता है।”

No.-16.विश्वनाथ के अनुसार रस का स्थायीभाव शोक और प्रमुख तत्व इष्ट का नाश और अनिष्ट की प्राप्ति है- “इष्टनाशादनिष्टाप्ते: करुणाख्यो रसो भवेत्।”- साहित्यदर्पण

No.-17.विश्वनाथ ने रस का मूल चमत्कार को मानकर अद्भुत रस का प्राधान्य माना है।

No.-18.वैष्णव आचार्यों ने भक्ति रस को प्रधान रस माना है।

No.-19.मधुसूदन सरस्वती और रूप गोस्वामी के अनुसार भक्ति-रस मधुरा भक्ति रस है, वास्तविक रस है, रसराज है, अन्य सभी रस उसी से निसृत हुए है।

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No.-23.साधारणीकरण सिद्धान्त

No.-24.रस का स्वरूप और प्रमुख अंग

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रामचंद्र-गुणचंद्र के अनुसार कुछ रस सुखात्मक होते हैं और कुछ दुखात्मक-

No.-1. सुखात्मक रस- श्रृंगार, वीर, हास्य, अद्भुत, शांत

No.-2. दुखात्मक रस- करुण, रौद्र, भयानक, वीभत्स

No.-3.अभिनव गुप्त ने केवल शांत रस को सुखात्मक माना है।

No.-4.कई आचार्य करुण, भयानक रसों को दु:खात्मक नहीं मानते बल्कि उन्हें भी सुखात्मक मानते हैं।

रसों की संख्या

No.-1.रसों की संख्या पर आचार्यों में काफी मतभेद है, परंतु अधिकतर 9 रस मानते हैं-

No.-2.भरत मुनि ने रसों की संख्या 8 मानी है।

No.-3.दंडी ने भी 8 रसों का उल्लेख किया है।

No.-4.उद्भट ने 9 रसों का उल्लेख किया है।

No.-5.रुद्रट ने प्रेयान् रस की अभिवृद्धि करके रसों की संख्या 10 कर दी।

No.-6.आनंदवर्धन ने 9 रस माना है।

No.-7.धनंजय ने काव्य के लिए 9 रस स्वीकार करते हैं, परंतु नाटक में शांत रस की स्वीकृति नहीं की।

No.-8.अभिनवगुप्त ने भी 9 रस माना है।

No.-9.भोज ने नाटकों के नायकों के आधार पर 4 रसों की परिगणना की है-

1) धीरललित : प्रेयान् रस, 2) धीरप्रशांत : शांत रस, 3) धीरोदात्त : उदात्त रस, 4) धीरोद्वत : उद्वत रस

No.-10.रामचंद्र-गुणचंद्र ने 9 रसों को माना है।

No.-11.विश्वनाथ ने वत्सल रस को स्वीकार करके रसों की संख्या 10 माना है।

No.-12.मित्र और विरोधी रस

No.-13.मित्र और विरोधी रस के सम्बन्ध में सर्वप्रथम आनंदवर्धन ने विशद चर्चा की और बाद में उनके अनुकरण पर मम्मट ने।

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परस्पर मित्र रस

मित्र रसों के एक-साथ वर्णन से कोई व्याघात नहीं होता, काव्यास्वाद-प्राप्ति में किसी प्रकार की वाधा नहीं पड़ती। प्रमुख परस्पर मित्र रस निम्न हैं-§  श्रृंगार और हास्य§  श्रृंगार और अद्भुत§  करुण और शांत§  करुण, भयानक और बीभत्स

No.-1.परस्पर विरोधी रस

No.-2.श्रृंगार       करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, शांत

No.-3.वीर           शांत

No.-4.हास्य        करुण, भयानक

No.-5.करुण       श्रृंगार, हास्य

No.-6.रौद्र           हास्य, भयानक

No.-7.भयानक  श्रृंगार, हास्य, रौद्र, वीर, शांत

No.-8.शांत          श्रृंगार, रौद्र, भयानक, हास्य

No.-9.वीभत्स    श्रृंगार

No.-10.विरोधी रस

 

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