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कबीरदास या कबीर 15वीं सदी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे। वे हिन्दी साहित्य के भक्तिकालीन युग में परमेश्वर की भक्ति के लिए एक महान प्रवर्तक के रूप में उभरे। इनकी रचनाओं ने हिन्दी प्रदेश के भक्ति आंदोलन को गहरे स्तर तक प्रभावित किया। उनका लेखन सिक्खों के आदि ग्रंथ में भी देखने को मिलता है।[1][2] वे हिन्दू धर्म व इस्लाम को मानते हुए धर्म एक सर्वोच्च ईश्वर में विश्वास रखते थे।
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रैदास | raidas
No.-1. रैदास का जन्म काशी, 1398 ई. में और मृत्यु काशी का गंगा घाट पर 1448 ई. में हुआ था। इनका रविदास नाम भी प्रचलित है। रैदास की पत्नी का नाम लोना था। इनके गुरु रामानंद थे।
No.-2. रैदास दिल्ली के सुल्तान सिकन्दर लोदी के समकालीन थे, उसके निमंत्रण पर वे दिल्ली भी गये थे। ये जाति के चमार थे अपने बारे में स्वयं कहा-
No.-3. “कह रैदास खलास चमारा, ऐसी मेरी जाति विख्यात चमारा।”
रैदास की रचनाएँ | raidas ki rachnaye-
No.-1. गुरु ग्रंथ साहिब में रैदास के 40 पद मिलते हैं जबकि ‘सतबनी’ में फुटकल पद मिलते है। निरीहता एवं जातीय कुंठाहीनता रैदास की कविताओं की प्रमुख विशेषता है।
No.-2. धन्ना एवं मीराबाई ने अपने पदों में इनका सादर उल्लेख किया है लेकिन रैदास ने अपनी रचनाओं में अपने गुरु रामानंद का उल्लेख नहीं किया है। इनको उदय और मीराबाई का गुरु माना जाता है।
गुरु नानक | Guru Nanak
No.-1. गुरु नानक का जन्म लाहौर के तलवंडी नामक स्थान पर जिसे अब ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है, 1469 ई. में हुआ था। इनकी मृत्यु सन 1538 ई. में हुआ था।
No.-2. गुरु नानक की माता का नाम तृप्ता और पिता का नाम कालूचंद्र खत्री था। इनकी पत्नी का नाम ‘सुलक्षणी’ था। ‘लक्ष्मीचंद्र’ और ‘श्री चंद्र’ इनके दो पुत्र थे। श्री चंद्र ने ‘उदासी संप्रदाय’ का प्रवर्तन किया।
No.-3. गुरुनानक सिख संप्रदाय / पंथ के प्रवर्तक थे। ये मुगल बादशाह बाबर के समकालीन थे। कहा जाता है कि बाबर से भी इनकी भेंट हुई थी। इनके साथ ‘रागी’ नामक मुसलिम शिष्य भी रहा करता था।
No.-4. गुरुनानक नें अपना उत्तराधिकार ‘लहना’ को सौपा तथा उसका नाम अंगद रखा। जपुजी नानक दर्शन का सारतत्त्व माना जाता है। नानक भेदाभेदवादी संत कवि हैं।
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गुरुनानक की परम्परा में उनके उत्तराधिकारी प्रमुख कवि
गुरु अंगद | Guru Angad-
No.-1. इनका जन्म 1504 ई. और मृत्यु 1552 ई. में हुआ था। इनके कुछ श्लोक या दोहे आदि ग्रंथ साहब में संकलित हैं।
गुरु अमरदास | Guru Amar Das-
No.-1. गुरु अमरदास तीसरे गुरु हैं। इनका जन्म 1479 ई. और मृत्यु 1574 ई. में हुआ था। इनके भी कुछ दोहे गुरु ग्रंथ साहब में संकलित हैं।
गुरु रामदास | Guru Ram Das-
No.-1. गुरु रामदास चौथे गुरु हैं। इनका जन्म 1514 ई. और मृत्यु 1581 ई. में हुआ था। इनकी रचनाएँ आदिग्रंथ के चौथे महला में संकलित हैं।
गुरु अर्जुनदेव | Guru Arjun Dev-
No.-1. गुरु अर्जुन देव पाँचवें गुरु हैं, इनकी गणना अच्छे कवियों में होती है। इनका जन्म 1563 ई. और मृत्यु 1606 ई. में हुआ था। गुरु ग्रंथ साहिब के पाँचवें महला में इनके 6000 पद संकलित हैं।
No.-2. इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ निम्नलिखित हैं- सुखमनी, बारहमासा, बावन आखिरी।
No.-3. गुरु अर्जुनदेव ने 1604 ई. में गुरुओं की बनियों तथा सिक्ख पंथ के बहार के कुछ संतों की बनियों का संग्रह और संपादन किया।
गुरु तेग बहादुर | Guru Tegh Bahadur-
No.-1. गुरु तेग बहादुर नौवें गुरु हैं। इनका जन्म 1622 ई. और मृत्यु 1675 ई. में हुआ था। इनकी रचनाएँ नौवें महला में संकलित हैं।
गुरु गोविन्द सिंह | Guru Gobind Singh-
No.-1. गुरु गोविंद सिंह अंतिम गुरु हैं। इनका जन्म 1664 ई. और मृत्यु 1718 ई. में हुआ था। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- चंडीचरित्, चौबीस अवतार, गोविंद रामायण, विचित्र नाटक।
No.-2. सिक्ख गुरु गोविंद सिंह ने गुरुओं की परम्परा समाप्त कर उनके स्थान पर ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ को गुरु पद पर प्रतिष्ठित किया और दशम ग्रंथ की रचना किया।
No.-3. नोट- नानकदेव की रचनाओं को एकत्रित करने का श्रेय गुरु अंगद को है, जबकि गुरु ग्रंथ साहिब में उनके प्रस्तुति का श्रेय गुरु अर्जुन देव को है।
दादूदयाल | Dadu Dayal
No.-1. दादू का जन्म अहमदाबाद, 1544 ई. में एक धुनिया (मुसलिम) परिवार में हुआ था। इनकी मृत्यु नराने, राजस्थान, 1603 ई. में हुआ था। दादू का मूलनाम दाऊद था।
No.-2. गरीबदास और मिस्कीदास इनके पुत्र थे। इन्होने दादूपंथ का प्रवर्तन किया। दादूपंथ को ‘ब्रह्म संप्रदाय’ या ‘परमब्रह्म संप्रदाय’ भी कहा जाता है।
No.-3. दादू पंथियों का प्रधान अड्डा नराना (जयपुर के पास) और भराने में है। इनका सत्संग स्थल ‘अलख दरीबा’ था। निर्गुण संतों की परंपरा में दादू की वाणी को कबीर की वाणी की व्याख्या मानी जाती है।
No.-4. दादू ने अपनी रचनाओं में बार-बार कबीर का नामोल्लेख किया है। इनकी जन्मकथा कबीर की जन्मकथा से काफी मिलती-जुलती है।
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No.-5. दादूदयाल के बावन शिष्य थे, जिनमें प्रमुख हैं- रज्जब, सुंदरदास, प्रागदास, जनगोपाल, जगजीवनदास, संतदास एवं जगन्नाथदास। दादू की रचनाओं का सर्वप्रथम संग्रह उनके दो प्रमुख शिष्यों संतदास एवं जगन्नाथ ने ‘हरडेबानी’ शीर्षक से किया था जिसे रज्जब ने पुनः ‘अंगवधू’ शीर्षक से संपादन किया।
No.-6. डॉ. परशुराम चतुर्वेदी ने दादू की प्रामाणिक रचनाओं का संकलन ‘दादूदयाल’ शीर्षक से सम्पादित किया है। दादू दयाल की रचनाओं की भाषा राजस्थानी, खड़ीबोली मिश्रित ब्रज भाषा है।
No.-7. दादू की बनियों से शासकों में अकबर सबसे अधिक प्रभावित हुआ था।
No.-8. दादू के महाप्रयाण के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र गरीबदास और कनिष्ठ पुत्र मिस्कीदास उनके गद्दी के क्रमशः उत्तराधिकारी हुए। दादू के शिष्य जगजीवन दास ने सतनामी संप्रदाय का प्रवर्तन किया था।
मलूकदास | Maluk Das
No.-1. मलूकदास का जन्म इलाहाबाद जिले के कड़ा गाँव में, 1574 ई. में और मृत्यु 1682 ई. में हुआ था। इनके पिता का नाम सुंदरलाल खत्री था। मलूकदास के गुरु ‘मुरर स्वामी’ थे।
No.-2. कुछ जगह मिलता है की ये ‘पुरुषोत्तम’ के शिष्य थे। मूलक पंथ के प्रवर्तक मलूक दास माने जाते है। इन्होने अपनी रचनाओं में अवधी एवं ब्रजभाषा दोनों का प्रयोग किया है।
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मलूकदास की रचानाएँ निम्नलिखित हैं-
क) अवधी- ज्ञानबोध, रतनखान, ज्ञानपरोछि
ख) ब्रज भाषा- भक्तवच्छावली स्फुट पद, भक्तिविवेक, विभवविभूति, बारहखड़ी, रामावतार लीला, ब्रजलीला, ध्रुवचरित, सुखसागर, दसरत्नग्रंथ, गुरु प्रताप, पुरुष विलास तथा अलखबानी आदि।
सुंदरदास | Sundar Das
No.-1. सुंदरदास का जन्म जयपुर के धौसा स्थान पर 1596 ई. में और मृत्यु 1689 ई. में हुआ था। इनके पिता का नाम परमानंद खाण्डेवाल था। सुंदरदास के गुरु दादू थे।
No.-2. सुंदरदास संत कवियों में सर्वाधिक काव्यकला निपुण, शास्त्रज्ञ एवं सुशिक्षित थे। ये कवित्त एवं सवैया छन्दों में रचना में सिद्धहस्त थे। इन्होंने काशी में रहकर शास्त्रों का अध्ययन किया था।
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No.-1. सुंदरदास की दो रचनाएँ- ज्ञान समुद्र और सुंदर विलास हैं। इनकी प्रामाणिक रचनाओं का संपादन ‘पुरोहित हरिनारायण शर्मा’ ने ‘सुंदर ग्रंथावली’ (दो भाग) शीर्षक से किया है। सुंदरदास की रचनाएँ ब्रज भाषा में मिलती हैं।
No.-2. सुंदरदास श्रृंगार रस की रचनाओं के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने केशव की ‘रसिकप्रिया’, नन्ददास की ‘रसमंजरी’ और सुन्दर कविराय के ‘सुंदर श्रृंगार’ की निन्दा की है-
No.-3. “रसिक प्रिया, रसमंजरी प्रिया अरू सिंगारहिं जानि।
No.-4. चतुराई करि बहुत विधि, विषैं बनाई आनि।।”
No.-5. सुंदरदास नें विभिन्न प्रदेशों की रीति-नीति पर विनोदपूर्ण उक्तियाँ कहीं हैं। जैसे-
No.-1. गुजरात- आभड़छीत अतीत सों होत बिलार और कूकर चाटत हांड़ी
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जंभदास | Jambh das
No.-1. जंभदास विश्नुई संप्रदाय के प्रवर्तक माने जाते है, इनका जन्म 1451 ई. में जोधपुर के पीपासर नामक ग्राम में हुआ था। इनका दीक्षान्त नाम ‘मुनीन्द्र जंभदास’ था।
No.-2. सम्भरा स्थल इनका समाधि स्थल है। इनके प्रमुख शिष्य थे– हावजी, पावजी, लोहा पागल दत्तनाथ, मालदेव।
हरिदास निरंजनी | Haridas Niranjani
No.-1. हरिदास निरंजनी का जन्म सन 1455 ई. और मृत्यु 1543 ई. में हुआ था। ये निरंजनी संप्रदाय के प्रवर्तक माने जाते हैं। यह संप्रदाय नाथ पंथ और संत काव्य के बीच की कड़ी माना जाता है।
No.-2. निरंजनी संप्रदाय उड़ीसा में प्रचलित था। मारवाड़ में इनके नाम पर कई मठ एवं गद्दियाँ हैं। हरिदास निरंजनी संतों को ईश्वर की तरह पूज्य मानते थे। इनकी रचनाएँ ब्रजभाषा में मिलती हैं।
No.-3. हरिदास के प्रमुख शिष्य थे- नारायणदास, हरिराम, रूपदास, सीतलदास, लक्ष्मणदास, गंगादास।
No.-4. निरंजनी संप्रदाय का प्रमुख मठ डीड़वाना में है। निरंजनी संप्रदाय को ‘हरिदासी संप्रदाय’ भी कहा जाता है। इस संप्रदाय का मूल श्रोत नाथपंथ है। निरंजनी संप्रदाय और मूलक पंथ में तंत्र साधना का प्रभाव अधिक है।
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No.-1. हरिदास निरंजनी की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं- ब्रह्मस्तुति, अप्टपदी जोगग्रंथ, हंस-प्रबोध ग्रंथ, निरपखमूल ग्रंथ, पूजाजोग ग्रंथ, समाधिजोग ग्रंथ, संग्रामजोग ग्रंथ। ‘हरिदास की परचई’ का संपादन हरिराम जी ने किया है।
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धर्मदास | Dharamdas
No.-1. ये ‘कबीर’ के शिष्य थे एवं उनकी गद्दी के उत्तराधिकारी भी हुए। कबीर को रचनाओं को ‘बीजक’ में संकलित करने का श्रेय इन्हीं को है। इनकी रचनाओं का संग्रह ‘धनी धरमदास की बानी’ शीर्षक ग्रंथ में संकलित है।
संत रज्जब | Sant Rajjab
No.-1. रज्जब का जन्म 1567 ई. और मृत्यु 1689 ई. में हुआ था। इनका मूल नाम ‘रज्जब अली खाँ’ था। ये ‘दादू’ के शिष्य थे। इन्होंने दादू की रचनाओं को ‘अंगबधू’ शीर्षक से संकलित किया।
No.-2. इनकी दूसरी रचना ‘सव्बंगी’ है जिसमें अपनी तथा अन्य प्रसिद्ध निर्गुण संत कवियों की वाणी का संकलन किया है।
लालदास | Lal Das
No.-1. लालदास का जन्म 1540 ई. और मृत्यु 1648 ई. में हुई थी। इन्होने राम को आराध्य मानते हुए लालपंथ का प्रवर्तन किया। लालदास का समाधि स्थल नगला, भरतपुर में है।
बाबालाल | Baba Lal
No.-1. बाबालाल का जन्म 1590 ई. और मृत्यु 1655 ई. में हुई थी। इन्होंने बाबालाली पंथ का प्रवर्तन किया। बाबा लाल का प्रधान स्थल गुरुदासपुर का श्रीध्यानपुर गाँव में है।
No.-2. बाबालाली संप्रदाय से संबंधित ‘बाबा लाल का शैल’ बड़ौदा में स्थिति है। इनके विचारों का संग्रह नादिरुन्निकात में संगृहित है। इनके ग्रंथ ‘असरारे-मार्फत’ में दाराशिकोह एवं बाबालाल की वार्तालाप संगृहीत है।
संत वीरभान | Sant Veerbhan
No.-1. ये साध संप्रदाय में दीक्षित ‘उदयदास’ के शिष्य थे। इनकी रचनाएं ‘बानी’ शीर्षक से उपलब्ध होती हैं। साध संप्रदाय के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘निर्वाण ग्यान’ एवं प्रिथीलाल के संग्रह ग्रंथ ‘साधपंथ’ में भी इनकी रचनाएँ मिलती है।
निपट निरंजनी
No.-1. ये निरंजनी संप्रदाय में दीक्षित थे। इनकी रचनाएँ ‘शांत सरसी’ एवं ‘निरंजन संग्रह’ नामक ग्रन्थों में उपलब्ध हैं।
अक्षर अनन्य | Akshar Ananya
No.-1. इन्होंने योग और वेदान्त पर कई ग्रंथ लिखे है। अक्षर अनन्य ने ‘दुर्गासप्तसती’ का अनुवाद हिंदी पद्यों में किया। राजयोग, विज्ञानयोग, ध्यानयोग, सिद्धान्तबोध, विवेक दीपिका, ब्रह्मज्ञान, अनन्य प्रकाश आदि इनके प्रमुख ग्रंथ हैं।
No.-2. अक्षर अनन्य छत्रसाल के गुरु भी थे।
शेख फरीद | Sheikh Farid
No.-1. इनका जन्म 1472 ई. और मृत्यु 1552 ई. में हुआ था। ‘शाह ब्रम्हा’, इब्राहीम शाह’ तथा ‘शंकरगंज’ शेख फरीद के अन्य नाम हैं। पंजाब के कवियों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। आदि ग्रंथ में इनके चार पद संकलित हैं।
संत बावरी साहिब
No.-1. sant kavya के कवियों में बावरी साहिबा महिला संत साधिका थीं। संत बावरी साहिब अकबर की सामयिक थी। इनका जन्म 1542 ई. और मृत्यु 1605 ई. में हुआ था।
सींगा | Sant Kavi Singaji
No.-1. सींगा जी महत्वपूर्ण संत कवि हैं, जिनकी दर्जनों रचनाएँ हैं। सींगा जी की रचनाओं की भाषा निमाड़ी है।