Jain dharm ke antim tirthankar kaun the

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जैन धर्म श्रमण परम्परा से निकला है तथा इसके प्रवर्तक हैं २४ तीर्थंकर, जिनमें प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) तथा अन्तिम तीर्थंकर महावीर स्वामी हैं। जैन धर्म की अत्यन्त प्राचीनता सिद्ध करने वाले अनेक उल्लेख साहित्य और विशेषकर पौराणिक साहित्यो में प्रचुर मात्रा में हैं। श्वेतांबर व दिगम्बर जैन पन्थ के दो सम्प्रदाय हैं, तथा इनके ग्रन्थ समयसार व तत्वार्थ सूत्र हैं।

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Que.-1. जैन धर्म के अंतिम तीर्थकर कौन थे ?

Ans. जैन धर्म के 24वें एवं अंतिम तीर्थकर महावीर स्वामी थे ।

No.-1. जन्म – –540 ई.पू.

No.-2. जन्म स्थान— कुंडग्राम (वैशाली )

No.-3. पिता —-सिद्धार्थ

No.-4. माता—- त्रिशला

No.-5. बचपन का नाम–वर्धमान

No.-6. पत्नी —यशोदा

No.-7. पुत्री— अनोज्जा प्रियदर्शनी

No.-8. मृत्यु —468 ई.पू. (पावापुरी )

No.-9. उन्होंने 30 वर्ष की उम्र में माता- पिता की मृत्यु के पश्चात अपने बड़े भाई नंदीवर्धन से अनुमति लेकर संन्यास- जीवन को स्वीकारा था ।

No.-10. 12 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद महावीर को जृम्भिक के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे तपस्या करते हुए संपूर्ण ज्ञान का बोध हुआ । इसी समय से महावीर जिन (विजेता), अर्हत (पूज्य) और निर्ग्रंथ (बंधनहीन) कहलाए ।

No.-11. महावीर ने अपना उपदेश प्राकृत भाषा में दिया ।

No.-12. महावीर के अनुयायियों को मूलत: निग्रंथ कहा जाता था । महावीर के प्रथम अनुयायी उनके दामाद जामिल बने ।

No.-13. प्रथम जैन भिक्षुणी नरेश दधिवाहन की पुत्री चंपा थी ।

No.-14. महावीर ने अपने शिष्यों को 11 गणधरों में विभाजित किया था । आर्य सुधर्मा अकेला ऐसा गंधर्व था जो महावीर की मृत्यु के बाद भी जीवित रहा और जो जैनधर्म का प्रथम थेरा या मुख्य उपदेशक हुआ ।

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